27 दिसंबर मिर्जा गालिब के जन्मदिवस पर विशेष : इश्क और दर्द का दूसरा नाम है गालिब ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतजार होता तेरे वादे पर जिये हम तो ये जहान झूठ जाना कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता मिर्जा गालिब मोहब्बत को जिस खूबसूरती से गालिब ने पेश किया है, वो सदियों बाद भी मोहब्बत करने वालों के एहसासों की जुबान बना हुआ है, इश्क होने पे गालिब याद आते हैं और दिल टूटने पे भी गालिब ही याद आते हैं, यही नहीं हर टूटा दिल खुद को उनमें ही ढाल लेने का तमन्नाई हो जाता है। उनका ये शेर कि ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता..., मैं जब भी पढ़ती या कहती हूं, तो सोचती हूं कि किस कद्र उनका दिल टूटा होगा और किस तरह से उन्होंने खुद को संभाला होगा कि हर हालात में शायरी का एक नायाब हीरा उनके अल्फाजों की रौ में बह निकला, उन्होंने अपन...