27 दिसंबर मिर्जा गालिब के जन्मदिवस पर विशेष :
इश्क और दर्द का दूसरा नाम है गालिब
अगर और जीते रहते यही इंतजार होता
तेरे वादे पर जिये हम तो ये जहान झूठ जाना
कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता
मिर्जा गालिब
मोहब्बत को जिस खूबसूरती से गालिब ने पेश किया है, वो सदियों बाद भी मोहब्बत करने वालों के एहसासों की जुबान बना हुआ है, इश्क होने पे गालिब याद आते हैं और दिल टूटने पे भी गालिब ही याद आते हैं, यही नहीं हर टूटा दिल खुद को उनमें ही ढाल लेने का तमन्नाई हो जाता है। उनका ये शेर कि ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता..., मैं जब भी पढ़ती या कहती हूं, तो सोचती हूं कि किस कद्र उनका दिल टूटा होगा और किस तरह से उन्होंने खुद को संभाला होगा कि हर हालात में शायरी का एक नायाब हीरा उनके अल्फाजों की रौ में बह निकला, उन्होंने अपनी शायरी को किसी लिंग में नहीं बांधा कि प्रेमी को लगे उसकी बात है, बल्कि एक प्रेमिका भी उनकी शायरी में खुद को उतना ही करीब पाती है।
जब भी मैं गालिब की तस्वीर देखती हूं, तो उनकी आंखों में इंतजार, होंठों में छिपा दर्द और माथे पे वक्त से शिकायत करती त्यौरियां नजर आती हैं और उनकी आंखें मानों मुझे अपनी ओर खींचती हुई प्रतीत होती हैं।
अपने एहसासों, इश्क की रवानगी और तिश्नगी को शायरी में पिरो कर दिल ही नहीं रूह तक को छू लेने वाले हर दौर के पसंदीदा शायर मिर्जा साहिब की कलम उनकी आखरी सांस तक आपके और मेरे लिए लिखती रही, बस उनकी सांस टूटने पर ही वह थम पाई, उस दिन वह कलम भी रोई होगी कि अब उन एहसासों का ब्यां वो कभी नहीं कर पाएगी और वह भी खामोशी से उनके साथ ही सो गई होगी कुछ अधूरे ख्वाबों को अपने में समेटे। बेवक्त वक्त का दीदार करने वाले गालिब का इंतजार आज भी वक्त कर रहा है कि शायद वो शायर कब्र से उठेगा और इश्क से दूर होकर वक्ती दिल्लगी की ओर जा रहे युवाओं को फिर से इश्क की वादियों की ओर ले आएगा। बीतते वक्त ने उनकी शायरी की उम्र को और भी जवां किया है।
इश्क की इबादत हो या खुदा से शिकायत, अपनों से शिकवा हो या उनसे मोहब्बत हर एहसास में लिखी शायरी में एक बात सांझी है कि उसमें से छलकता दर्द हर किसी को नजर आता है, भले ही उन्होंने अपने अल्फाजों में अपने दर्द का दरिया समेटा हो, पर उसकी रवानगी में खुद को बहने से आज तक कोई नहीं रोक पाया। कितने ही शायरों की तमन्ना है कि वह काश उन जैसा बन पाएं, परंतु मशहूर शायर मिर्जा गालिब हर कोई बन पाए, यह तो संभव नहीं। मोहब्बत, दर्द और जुदाई से भले ही हर कोई निकलता है, परंतु कह पाने की नफासत हर किसी के पास नहीं होती।
मिर्जा गालिब का असली नाम मिर्जा असदउल्ला बेग खान गालिब था। उनका जन्म 27 दिसंबर, 1797 को उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। तर्सम खां के पुत्र कौकान बेग खां शाहआलम के शासन काल में, अपने पिता से झगड़ कर वह हिंदुस्तान चले आए। कौकान बेग गालिब के दादा थे। जब गालिब महज पांच साल के थे, तभी उनके पिता अब्दुल्लाबेग का देहांत हो गया था। वो चाचा नसरुल्ला बेग खां की देख रेख में बड़े हुए, जो मराठों की ओर से आगरा के सूबेदार थे।
कुछ यूं लिखा टूटे दिल पे गालिब ने कि वह हर दौर में इश्क में मिले दर्द का पर्याय बन गए।
15 फरवरी, 1869 में भले ही गालिब दुनिया छोड़ कर चले गए, परंतु जमाना उन्हें कभी भूल न पाए, इसकी वजह भी दे गए।
हेमा शर्मा
मिर्जा गालिब के मशहूर शेर
इस कदर तोड़ा है मुझे उसकी बेवफाई ने ए गालिबअब कोई अगर प्यार से भी देखे तो बिखर जाता हूं
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होते तक
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हैं और भी दुनिया में सुखऩ-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है
हज़ारों खवाहिशें ऐसी कि हर खवाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले
उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
कल तक तो कहते थे गालिब बिस्तर से उठा नहीं जाता
आज दुनिया से जाने की ताकत कहां से आ गयी
इश्क ने गालिब निकम्मा बना दिया
वरना आदमी हम भी थे काम के

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