क्यों चटकें स्नेह के धागे
अक्सर समाचार पत्रों में पढऩे को मिल जाता है कि किसी भाई ने अपनी बहन के प्रेम प्रसंगों के चलते या संपत्ति के कारण निर्मम हत्या कर दी, तो पढ़ कर मन में यह सवाल उठते हैं कि जिस मां-जाई ने उसकी कलाई पर बरसों राखियां बांध कर उसकी लंबी उम्र की कामना की, उसे उन हाथों से एक भाई कैसे मार पाया होगा। जिस बहन के साथ वह बचपन में खेला और उसकी एक मुस्कान के लिए अपनी पॉकेटमनी से खिलौने लाता रहा, उसे मौत की घाट उतारते हुए क्या उसे बहन की भोली मुस्कान याद न आई होगी।
राखी का त्यौहार आते ही जहां भाई-बहन के मन में उल्लास छा जाता है। यह तो ऐसा बंधन है, जो राखी के रेशमी धागों से शुरू हो कर रक्षा के मजबूत वचन तक पहुंचता है। इस रिश्ते में मिठाई की मिठास और चटपटे नमकीन दोनों का मजा एक साथ है।
ऐसे में बड़े भाई या छोटे भाई का बहन को गला दबा कर मारना या कुल्हाड़ी से काट देना जैसी वारदात को मात्र इसलिए अंजाम दे देना कि उसने अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने की गलती की थी, तो लगता है मानों रिश्तों की मजबूत नींव में कोई विनाशक कंपन हुआ हो। दिल से सारी ममता और प्यार मानों पल में गुस्से की आग में जल गई हो और उस पर पश्चाताप का नाम भी न हो।
क्यों याद नहीं आते उस भाई को वह पहले पल जब उसने पहली बार छोटी बहन को देखा था, जिस बड़ी बहन ने उसे गोद में खिलाया था। क्यों याद नहीं आते उसे वह पल जब वह बहन की रक्षा के लिए स्कूल में दूसरे बच्चों से भिड़ जाता था, क्यों याद नहीं आती उसे बहन की वह निश्चल मुस्कान जो उसके घर आने पर होंठों पर खिल जाया करती थी और क्यों भुला देता है, वह उन राखियों को जिनका वह खुद रक्षक था।
कभी बहन को चोट लगने पर खुद सिसक उठने वाला भाई क्यों बहन की सिसकियों और जान बचाने को पीछे हटते उसके कदमों से नहीं पसीजता, क्यों हर पल उसकी फिक्र करने वाला संवेदनहीन हो जाता है, आखिर कमी कहां है उनकी परवरिश में जो बेटे को सही और बेटी को गलत ठहराती है या पाश्चात्य की ओर उठते कदमों में, जहां रिश्तों की अहमियत ही नहीं है। हम क्यों रिश्तों को ले कर इतने पजेसिव हो जाते हैं कि उन्हें स्पेस या स्वतंत्र व्यक्तित्व देना ही नहीं चाहते हैं, या इतने लावरवाह हो जाते हैं कि दूसरे की ङ्क्षजदगी में पहले तो झांकते नहीं और यदि झांकते हैं तो कमियों से आग-बबूला हो उठते हैं।
क्यों दिलों से प्यार इस कद्र खत्म होने लगा है कि बहन के हाथों में उसके प्यार की मेहंदी देखना भी गवारा नहीं होता। क्यों नहीं समझ आता ऐसे लोगों को कि रक्षा बंधन का त्यौहार तो हर साल आएगा, परंतु वह हाथ ही न होंगे जो उसकी कलाई पर राखी बांध कर उसकी सलामती के लिए उठेंगे।
हेमा शर्मा, चंडीगढ़
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