तुम्ही में है मां दुर्गा ... ...

नारी केवल श्रृंगार करना ही नहीं जानती, बल्कि समय आने पर शस्त्र उठाना भी जानती है, वह केवल मां बन वात्सल्य लुटाना ही नहीं जानती, बल्कि क्रोध आने पर महिषासुर को मारना भी जानती है। उसकी वाणी में प्रेम के तराने ही नहीं है, बल्कि अन्याय के खिलाफ उठती उसकी गर्जना भी है अर्थात मां दुर्गा के नौ रूपों को नारी खुद में संजाए होने के बावजूद भी अनजान है कि मां दुर्गा मूर्तियों में ही नहीं खुद उस में भी विराजमान है और अब वक्त गया है कि वह स्वयं में उन शक्तियों को जागृत करे, ताकि जहां दूसरों को प्रेम और संयम सिखा सके, वहीं अन्याय करने वालों के खिलाफ आवाज भी उठा सके।
मां दुर्गा का हर रूप प्रेरणादायी तथा जीवन में ऊर्जा का संचार करने वाला है, यदि आप भी अब तक उन रूपों को स्वयं में आत्मसात् नहीं कर पाई हैं, तो इस दुर्गा अष्टमी पर उसे पहचान कर कम से कम एक दिव्य रूप को तो स्वयं में उतारने का प्रयास करें, फिर देखें कि आप में ही नहीं दूसरों में भी बदलाव जाएगा।

दृढ़ता
मां दुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री का है, जब सती अपने पति भगवान शंकर का अपमान सहन नहीं कर पाई तो खुद को जला कर भस्म कर लिया। सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया तथा शैल पुत्री के नाम से जानी गई। शैलपुत्री दृढ़ता का प्रतीक है तथा नारी को भी उनकी तरह ही दृढ़ बनना होगा, यदि आप अपने जीवन में अपने इरादों और सपनों को पूरा करने के लिए दृढ़ता से खड़ी हो गईं, तो फिर कोई भी आपको दबा नहीं पाएगा।

संघर्ष
मां दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है, जो कि मनवांछित फल पाने के लिए कठोर संघर्ष करने हेतु प्रेरित करता है। ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। यदि आपको भी खुद पर विश्वास है तो संघर्ष करें, अंत में जीत आपकी ही होगी।

वीरता
मां दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा का है, इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इनके घंटे की ध्वनि से दानव-दैत्य सब कांप उठते हैं अर्थात मां दुर्गा का यह रूप वीरता का प्रतीक है। आज के युग में डरी-सहमी महिलाओं को यह रूप मन में जगाना होगा, तभी तो वह निर्भय बन कर मुश्किलों का सामना कर सकती है तथा जीवन में आगे बढ़ सकती है।

रचनात्मकता
मां दुर्गा के चौथे रूप देवी कूष्माण्डा को आदि शक्ति कहा जाता है, जब सृष्टि नहीं थी तथा चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा था, तब मां कूष्माण्डा ने ब्रह्मांड की रचना की तथा इन्हीं का तेज सभी वस्तुओं और प्राणियों में व्याप्त है। जीवन में सफलता के लिए रचनात्मकता का गुण बेहद जरूरी है, इसी से तो आप नया दौर और सफल जीवन रच सकती हैं।

ज्ञान
स्कंदमाता मां दुर्गा का पांचवां रूप हैं, स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। चेतना का निर्माण करने वाली इस देवी की कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। आज नारी ने अपनी बुद्धि, ज्ञान और विवेक के बल पर तेजी से तरक्की की है। पढ़ाई-लिखाई से लेकर करियर तक में महिलाओं ने हर क्षेत्र में खुद को बेहतर साबित कर दिखाया है। यहां केवल किताबी ज्ञान की ही बात नहीं है, बल्कि आप अपनी मां या सास से अच्छी चीजें, बातें एवं संस्कार सीख कर उन्हें अपने जीवन में लागू कर सकती हैं, इससे जहां आपकी स्किल्स में इजाफा होगा, वहीं आप दूसरों को भी व्यवहारिक ज्ञान बांट सकेंगी।

शोध
मां दुर्गा का छठा रूप है कात्यायनी तथा इनका विशेष गुण शोधकार्य रहा है। अत: किसी भी काम में महारत हासिल करने के लिए जरूरी है कि अपने काम या विषय में पूरा शोध किया जाए। यदि आप जीवन में कुछ बड़ा करना चाहती हैं तो शोध को महत्व दें, जैसे कि बिना जानकारी के कोई दवा बच्चे को दें या फिर खाना बनाने में पूरी तरह से पारंगत होना जरूरी है, इससे आप में आत्म विश्वास पैदा होगा।

उजाला करें
मां दुर्गा का सातवां रूप कालरात्रि का है, जो कि देखने में भयानक है, जिनके सिर के बाल बिखरे हुए हैं तथा शरीर का रंग एकदम काला है। मां कालरात्रि अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति है। यह काल से भी रक्षा करती है। इन्हें दुर्गा के बेहद शक्तिशाली रूपों में से एक माना जाता है। अपने जीवन की अंधकारमय परिस्थितियों का नाश करने के लिए नारी को खुद ही पहल करनी होगी। दूसरों पर निर्भर रहने से अकसर बाद में पछताना पड़ता है, सो खुद को मजबूत बनाएं तथा अपने पैरों पर खड़ी हों।

शांति
मां दुर्गा का आठवां रूप महागौरी का है, इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। यदि आप भी अपने जीवन में खुश रहना चाहती हैं तो आपको जीवन में चल रहे उतार-चढ़ावों के दौरान शांत रहना होगा। यदि आप महागौरी की तरह शांत मुद्रा में रह कर काम करेंगी तो कोई तनाव नहीं होगा और परिवार में खुशियां आएंगी। जीवन में संतोष को प्राथमिकता दें तभी तो आपको शांति और सुकून मिलेगा।

खुशियां बांटें
मां दुर्गा के नौंवे रूप सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव को अर्धनारीश्वर कहा जाता है। आप मां सिद्धिदात्री से सबको खुश रखने की कला सीख सकती हैं, अपने परिवार वालों की सब इच्छाएं पूरी करके ही तो आप खुद प्रसन्न रह सकती हैं, परंतु सबका ख्याल रखने के साथ-साथ खुद का ख्याल रखना चाहिए।
                                      हेमा शर्मा

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