अभी उड़ान बाकी है...
नारी या तो देवी है या दासी, नारी या तो करुणा की मूरत है या फिर क्रूरता की मिसाल, कहीं उसे ताडऩ की अधिकारी माना गया तो कहीं उसके आंचल में दूध और आंखों में पानी की बात की गई है, अपने लिए तय हर मिसाल को नारी ने अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया, परंतु वह भी सामान्य एक इंसान है, यह दर्जा उसे आज तक नहीं मिला और खुद के लिए यही स्थान पाने की उसकी लालसा मानों उसका संघर्ष बन गई। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के आयोजनों पर अपने हक और अधिकार की वह आवाज उठाने लगी। यह सत्य है कि घर-परिवार हो या समाज या देश या विश्व, किसी भी क्षेत्र में शोषण जब अपने चरम पर पहुंचता है, तभी प्रतिरोध के स्वर जन्म लेना आरंभ करते हैं । भले ही नारी ने आज धरा से लेकर क्षितिज तक में अपने नाम का परचम लहराया है और सफलता के विभिन्न सोपानों को छुआ है, परंतु इसे आधी आबादी की पूर्ण रूप सफलता नहीं माना जा सकता, अभी भी उसकी उड़ान बाकी है, जिसे अपनी कोशिशों से उसे निरंतर दूर करते जाना है।समस्याएं कम नहीं
महिलाओं से संबंधित समस्याएं कम नहीं हैं, हर वर्ग, हर उम्र, हर जाति और शहरों और कस्बों में रहने वाली महिलाओं की ढेरों समस्याएं आज भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसा नहीं है कि इन पर काम नहीं होता, बल्कि कुछ मुद्दे तो आंदोलन का रूप धारण कर गए और उससे नारी जाति को निजात दिला गए, सति प्रथा और बाल विवाह, दहेज, स्त्रीलिंग परीक्षण इनके सशक्त प्रमाण हैं, जिनसे समाज में एक व्यापक बदलाव आया। दामिनी केस में हुए आंदोलन ने बलात्कार की शिकार महिलाओं के लिए सजा का प्रावधान बदल दिया। यह सच है कि इनमें से हर समस्या जड़ से भले ही ना मिटी हो तथा आज भी कहीं ना कहीं उसकी सिसकियां सुनाई देती हैं, परंतु फिर भी इन्हें काफी हद तक तो कम किया ही गया है।महिला आंदोलनों और संगठनों की सक्रियता का परिणाम ही आज हमें देखने को मिलता है कि अब किसी भी क्षेत्र में महिलाओं की समस्याओं को अनदेखा करना दूसरों के लिए मुश्किल होता जा रहा है । हर राजनीतिक पार्टी में महिलाओं की संख्या में वृद्धि होने लगी है ।
यह अलग बात है कि राजनीतिक पार्टियों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, आधुनिकता और उदार सोच के तमाम दावों के बावजूद स्त्री की सामाजिक स्थिति या उत्थान में कोई बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं आया और वे आज भी समझौते और दोहरे कार्य भार के बीच पिस रही हैं । पुरुष सत्ता की नींव को तोडऩा, बदलना या संवारना अभी भी एक लंबी लड़ाई है।
हाउस वाईफ से होम मेकर बनी
आज भी भारतीय परिवारों में गृहणी को उसके काम का वेतन नहीं मिलता और आज भी उसे वही पुराना ताना मिलता है कि वह घर बैठे करती क्या है, जबकि एक परिवार को बनाने में उसकी भूमिका, उसके प्रयासों और उसका त्याग किसी भी चीज से कम नहीं है, हां बीते दिनों में फर्क केवल इतना ही आया है कि वह हाउस वाईफ से होम मेकर का तबका पा गई है और बच्चों के लिए सुपर मॉम बन गई है, परंतु इस बदले हुए विशेषण से महिलाओं के दोयम दर्जे में कोई विशेष अंतर नहीं आया, वह आज भी वहीं है जहां वह कई दशक पहले थी।अपने लिए अलग मुकाम की तलाश में नारी ने घर से बाहर कार्य क्षेत्र में कदम रखा, परंतु आर्थिक आजादी ने उसे दोहरी जिम्मेदारी दे दी।
समस्याएं बढऩे लगी
नारी की समस्याओं में दिनों दिन समस्याएं भी बढ़ती चली गईं, कभी पति के शक का सामना तो कभी विचारों का मतभेद, जिससे कि दिनों दिन तलाक के मामले भी बढऩे लग गए, इसका नतीजा यह निकला कि आज के दौर में महिलाओं ने अकेले रहना बेहतर समझा और समाज में सिंगल का स्टेट्स बरकरार रखने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि होने लगी।ऐसे होगा निदान
समाज में फैली समस्याओं और कुरीतियों का तभी निदान हो पाएगा यदि उस पर व्यापक सुधार और बदलाव घर से ले कर देश तक में किए जाएं, रिश्तों से ले कर कानून तक में किए जाएं।- बेटियों को जन्म से ले कर शिक्षा के बराबर अधिकार मिलें।
- बेटियों की परवरिश में उनके सम्मान और आत्म विश्वास को बढ़ाने पर जोर होना चाहिए।
- महिलाओं के प्रति सोच और नजरिया समाज में बदलना चाहिए।
- कमजोर तबके की महिलाओं को जागरुक किया जाए।
उत्सव बन कर रह गया
8 मार्च का दिन पूरी तरह से अपने रूप को बदलता जा रहा है, इस दिन महिलाएं भी पार्टी या शॉपिंग कर इसे पूरे इंजॉयमैंट के साथ मनाना शुरू करती हैं, मानों यह कोई बहुत बड़े उत्सव का दिन हो, परंतु एक आम महिला को इससे कोई लेना देना नहीं और वह अपने रोजमर्रा के कामों में ही उलझी रहती है। बहुत से संस्थान या कंपनियां भी इस दिन जश्न मना कर या कामगार महिलाओं को पिकनिक पर ले जा कर कोई भेंट या मिठाई का पैकेट थमा कर अपनी औपचारिकता निभा लेती है ।हेमा शर्मा



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