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इस उम्र में – हेमा शर्मा

इस उम्र में – हेमा शर्मा

(इस उम्र में मेरी यह कहानी साल 2017 में मेरे कहानी संग्रह वो अजनबी में प्रकाशित हुई थी, जिसे चंडीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लघु कहानी संग्रह का अवार्ड में मिला था। आने वाली फिल्मबधाई हो का कांसैप्ट इसी कहानी से मिलता-जुलता है। )

इस उम्र में… …

रमन शर्मा ने देखा कि उनकी पत्नी मनोरमा डाइनिंग टेबल पर आचार के चटखारे ले रही है, तो उन्होंने सोचा कि शायद उसे एसीडिटी होगी, यह सोचते हुए वह अपनी टॉय शॉप पर चले गए, दो दिन बाद देखा कि पूरे घर का आलम ही बदला हुआ है, पत्नी खुशी से चहक रही है और पकवानों की खुशबू से पूरा घर महक रहा था। पत्नी ने कान में धीरे से जो कहा, उसे सुन कर तो शर्मा जी को भी चक्कर आ गए, क्योंकि अभी बेटी की शादी को दो महीने ही हुए थे।
बात ही कुछ ऐसी थी, क्योंकि जब पत्नी शर्माते हुए पति के कान में यह खबर सुनाती है कि आप बाप बनने वाले हैं, तो हर पति का चेहरा खुशी से खिल उठता है और उसका जी चाहता है कि वह जमाने भर को यह खुशखबरी सुना दे, परंतु 52 वर्ष की उम्र में जब कोई एक शादीशुदा बेटी के बाप को तो यह खबर सुनाए, तो उसे यह समझ में ही नहीं आता कि वह कहांं जा कर स्वयं को दुनिया की नजर से छिपा ले।

अ … ऐसा कैसे हो सकता है…? रमन ने अचकचाते हुए पूछा।

क्या मतलब हुआ इस बात का…, प्यार नहीं करते हो क्या मुझसे…,  श्रीमती जी ने आंखें तरेरते
हुए पूछा।

म-म…मेरा वो मतलब नहीं था…, मतलब डॉक्टर ने…,  उनकी बात अधूरी ही रह गई।
तो क्या मैं ऐसे ही कह रही हूं…, हमारे फैमिली डॉक्टर ने कंफर्म किया है, यह रही प्रेगनेंसी रिपोर्ट…, यह कहते हुए चांदनी ने अदा से पति के सामने रिपोर्ट रख दी।
अब तो रमन को समझ ही नहीं आ रहा था कि वह कहां जा कर धरती में समा जाए, परंतु धरती में समाने वाले इस वाक्य पर भी तो महिलाओं का एकाधिकार था, सो धरती उन्हें समाने की जगह क्यों देती…, खैर लग रहा था कि अब तो लोग मजाक उड़ाएंगे ही, क्या करें और क्या न करें।

मनोरमा में फिर से वह 24 साल वाला उत्साह लौट आया था, उन्होंने एक इंटीरियर डिजाइनर को बुलाया और उसे एक न्यू बोर्न बेबी के हिसाब से उस रूम को डेकोरेट करने को कहा। वह उस रूम को पिंक और ब्लू का कांबिनेशन देना चाहती थीं, बेटा हुआ तो ब्लू, बेटी हुई तो पिंक और यदि ट्विंस हुए तो दोनों ही कलर कराना एक समझदारी वाली बात हुई। ट्विंस वाली सोच तो रमन को चक्करघिन्नी बनाने के लिए काफी थी।

हे राम…, इस उम्र में वह नाना बनने की अपेक्षा फिर से बाप बनने जा रहे थे…। लोग क्या कहेंगे, बेटी-दामाद क्या सोचेंगे, सबसे नजरें कैसे मिलाएंगे… पर गलती तो हो गई, अब कुछ नहीं हो सकता।

दुकान पर पहुंचने पर भी उन्हें यही लग रहा था कि लोग उन पर हंस रहे हैं, जब कोई यह पूछता कि छोटे बच्चे के लिए कौन सा खिलौना सही रहेगा, तो उन्हें लगता कि वह कह रहे हैं कि भाई साहब आप को इस उम्र में दोबारा बाप बनने पर कैसा लग रहा है।

शाम को वह घर वापिस लौटे तो हद तो उस समय हो गई थी, जब उनकी बेटी सोना अपने पति मोहित के साथ आई हुई थी। अरे जनाब… खाली आई ही नहीं थी, बल्कि अपनी मां के लिए इमली और गोल-गप्पे भी पैक करा कर लाई थी, यह तो शुक्र है कि आम का सीजन नहीं था, नहीं तो वह अंबियां भी ले आती… और मोहित तो मेरे साथ इस मौके को सैलीब्रेट करने के लिए शैंपेन की बोतल भी साथ ले कर आया था। मनोरमा सोफे पर आराम से बैठी इमली के चटखारे ले रही थी।

पापा जी…, मुबारक हो…,  कहते हुए दोनों ही रमन के गले से लग गए।

पापा… आप नहीं जानते… मैं शुरू से ही भगवान से इस बात का गिला किया करती थी कि मुझे ही कोई भाई-बहन क्यों नहीं दिया और देख लो भगवान ने मेरी सुन ली…, यह होता है सच्चे मन से मांगी गई दुआ का असर, कभी तो रंग लाती ही है…।  खुशी से धाराप्रवाह बोलते हुए सोना बोले जा रही थी।

हे भगवान…, जब इसकी दुआ इतने साल पहले इसकी उम्र में नहीं सुनी, तो मेरी इस उम्र में सुननी क्यों जरूरी थी, भगवान आपने यह अच्छा नहीं किया…, वक्त निकल जाने पर किसी की मुराद पूरी करने का क्या मतलब हुआ…, आपका दुआ सुनने वाला विभाग भी सुस्त है क्या…, मेरी नाक कटवा कर आपको और मेरी बेटी को कितनी खुशी मिल रही है…, यह आपने अच्छा नहीं किया…।  रमन बुदबुदाते हुए बेटी की दुआ पर भगवान से अपना शिकवा कर रहे थे।

तब तक शैंपेन की बोतल खुल चुकी थी और शोर में उनका गिला दब चुका था।

पापा जी…।

आवाज सुन कर चौंके थे रमन और उन्होंने अपने दामाद मोहित की ओर कुछ इस तरह से देखा कि बेटा मेरा कोई कसूर नहीं है…, मैं यह सब बिल्कुल नहीं चाहता था। उनके चिंतातुर चेहरे को देख कर दामाद ने उनके हाथों में शैंपेन का गिलास पकड़ाया और कहा,
आप चिंता क्यों कर रहे हैं…, मैंने और मेरे पेरेंटस ने यह डिसाइड किया है कि जब तक मम्मी जी कि डिलीवरी नहीं हो जाती सोना यहीं रहेगी और मम्मा का पूरा ध्यान रखेगी…। हम सब आपके साथ हैं…।

दामाद की बातें सुन कर रमन को लगा मानों  वह कह रहा है कि बुड्ढे शर्म नहीं आई…, मेरे बाप बनने की उम्र में खुद बाप बन बैठा है…, मैं क्या अपने बच्चे की जगह अब तेरे बच्चे को गोद में खिलाउंगा…।

व-वो… वो बेटा मैं नहीं चाहता…,  अपने ख्यालों को सच मान कर रमन सफाई देने लगे।
अरे पापा… आपके न चाहने से कुछ नहीं होता, मम्मा को अब रेस्ट की जरूरत है… और फिर सोना भी मम्मी जी से काफी कुछ सीख लेगी, कल को उसे भी तो…,  मोहित ने अपनेपन से कहा।

इतनी देर में पत्नी पहली बार बोली,  अजी सुनते हो…।

अब भी कुछ सुनना बाकी रह गया है…,  रमन ने झल्लाते हुए कहा।

सुनो तो…, जो रूम मैं आने वाले बेबी के लिए तैयार करवा रही थी न, जरा उसमें जा कर तो देखो, मोहित ने उसे खिलौनों से भर दिया है…, हाउ क्यूट…।

लो जी अब यही सब रह गया था…, पता नहीं आगे-आगे क्या होगा…।

खैर रमन धीरे-धीरे अपनी पत्नी की खुशी में शामिल होते हुए इस अप्रत्याशित सिचुएशन को स्वीकार करने की कोशिश करना शुरू कर देता है, क्योंकि यदि मनोरमा, सोना और मोहित इन पलों को सहजता से जीने में विश्वास रखते हैं और इन पलों को इंजॉय कर रहे हैं, तो वह क्यों टैंशन ले रहे हैं। अब रब की यही मर्जी है, तो वह क्यों टैंशन ले रहे हैं…।

आखिर वही हुआ जिसका रमन शर्मा को डर था कि लोग उनका मजाक उड़ाएंगे। पत्नी ने बच्चे के रूम के साथ लगते बाथरूम को रेनोवेट करवाने के लिए प्लंबर को बुलाया हुआ था और उसे सब कुछ समझा दिया कि हर चीज पिंक कलर में ही होनी चाहिए। बाथरूम तैयार हो गया और उसे देख कर श्रीमती जी का पारा चढ़ गया।

अरे…, तुम से कहो कुछ तुम करते कुछ और हो…, बताओ तो एक छोटे बच्चे के लिहाज से फिटिंग करने को बोला था और तुमने इसे बड़ों के लिहाज से बना दिया…। कोई बात ढंग से तुम्हारी समझ में आती है या नहीं…।

पर मैडम…, घर पर तो सब बड़े लोग हैं न…, बच्चे के हिसाब से बनवाएंगी तो कोई भी इसे यूज नहीं कर पाएगा…।

अरे…, तू प्लंबर है या सलाहकार…, जो कहा है वैसा ही कर, पूरी सेटिंग को बदलो…, नहीं तो एक पैसा नहीं मिलने वाला…।

इतने में कमरे में सोना आई और बोली, भइया…, मम्मी जी जैसा कह रही हैं, वैसा ही कर दो क्योंकि जल्द ही इस घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है…।

अच्छा-अच्छा …, मैं सब समझ गया दीदी आप मां बनने वाली हैं न…, मुबारक हो मैडम जी… आप जल्द ही नानी बन जाएंगी…, पहले ही बता देतीं तो मैं वैसा ही बना देता…।

सोना और मनोरमा से कुछ न बोला गया, परंतु जाहिर सी बात है कि दोनों में से शायद कोई भी कुछ बोल कर सवालों का पहाड़ नहीं खड़ा करना चाहती थी। रमन बाबू को लगा कि अब शायद उनकी पत्नी अबोर्शन का निर्णय ले लेगी, क्योंकि धीरे-धीरे लोग ऐसा तो कुछ न कुछ कहते ही रहेंगे, परंतु वह गलत थे, क्योंकि मां-बेटी जल्दी ही अपनी खुशियों की काल्पनिक दुनिया में वापिस लौट आई थीं।

रमन बाबू को अक्सर लगता कि जरूर डॉक्टर के पास रिपोर्ट बदल गई होगी तथा किसी और के घर की खुशखबरी उनके घर आ गई, वास्तव में जो पति-पत्नी इस खुशी के हकदार हैं, वे अपनी खुशी सेलीब्रेट करने से मात्र इस लिए महरूम रह गए हों कि पता चला हो, उनकी पत्नी गर्भवती नहीं है, बल्कि उसे केवल एसीडिटी की प्रॉब्लम है, जो कि वास्तव में उनकी पत्नी की प्राब्लम थी और उनकी पत्नी बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बन कर अपने साथ सबको दीवाना बना रही हो। अपनी इस शंका को कंफर्म करने के लिए रमन बाबू अपने डॉक्टर को फोन करते हैं तो वह भी उसे बधाई देते हुए बताता है कि रिपोर्ट बिल्कुल सही है और वह मनोरमा को पूरी तरह से आराम कराने की सलाह देता हैं। अब घर के काम की सारी जिम्मेवारी सोना के कंधों पर आ जाती है, जिसने कभी कोई काम नहीं किया, उसे सारे काम करने पड़ते हैं, परंतु किसी नन्ही बच्ची की तरह वह सारी जिम्मेवारी उठा लेती है, क्योंकि उसके घर उससे खेलने के लिए कोई भाई या बहन आने वाला है… मतलब बेटी को तो लगता ही नहीं कि उसे अपने ससुराल वापिस भी जाना है।

रमन बाबू भी डॉक्टर से सच जानने के बाद फिर से खुद को पत्नी के नाज नखरे उठाने के लिए तैयार कर लेते हैं, पति का बदला व्यवहार मनोरमा को भाव-विभोर कर देता है।
सुनो जी…, मुझे तो लगता था कि आप मुझ से पहले जैसा प्यार ही नहीं करते अब…, परंतु इस मौके ने मुझे बता दिया कि आप मुझे कितना चाहते हैं…,  एक दिन पति के कंधे पर सिर टिका कर बैठी मनोरमा ने कहा।

अब यह दुआ मत करना कि ऐसा मौका बार-बार आए…,  पत्नी की बात पर रमन बाबू खीझते हुए बोले।

आप भी न…, अच्छा…, यह तो बताओ कि जब आपका बेटा आप को तोतली जुबान से पापा-पापा कहेगा, तो आपको कैसा लगेगा…,  पत्नी ने उनके भावों से अनजान हो कर पूछा।

जबकि रमन बाबू उसकी इस बात से फिर सोचों में डूब गए, उनको इस बात की चिंता लग गई कि जब वह 72 साल का होंगे तो उनका बेटा तब कहीं जा कर 20 साल का होगा, यदि कहीं वह पढ़ाई में नालायक निकला तो पांच साल और आगे बढ़ा लो, जब वह कॉलेज से निकलेगा, पता नहीं वह उस समय जिंदा भी होंगे या नहीं।

अब रमन उस बच्चे को दिल से स्वीकार करने लगता है, जो कि फिर से उन्हें इस उम्र में बाप बनने का सौभाग्य देने वाला है, यह सब सहज नहीं था, उस दिन वह फिर पत्नी को इस सारी सिचुएशन के लिए जिम्मेवार ठहरा रहे थे कि अचानक उनकी पत्नी ने आंसू भर कर कहा कि इन परिस्थितियों के लिए वह भी बराबर का जिम्मेवार है, क्योंकि यह बच्चा उनके प्यार की निशानी है और बार-बार यह शब्द कह कर वे उस आने वाले नन्हे जीव को अनचाहा करार नहीं दे सकते…।
हेमा शर्मा

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