तुझे सब है पता है ना मां... 

मां तो जीवन की हर भावना का खूबसूरत अहसास और प्यारी सी लोरी है। मां कभी ताबीज बन कर बुरी नजर से बचाती है, तो कभी आशीर्वाद बन जाती है, कभी गर्म दोपहरी में ठंडी छांव सी है, तो कभी जाड़े की नर्म धूप सी है और कभी सावन की ठंडी हवा का झोंका है। मां के आंचल की छांव में हर गम जुदा हो जाता है और उसकी गोद में सिर रखते ही मीठी निंदिया आ जाती है। मां जब बच्चे को कहानी सुनाती है तो उसका चेहरा परी के जैसा ही नजर आता है।
तभी तो कहते हैं कि तुझे सब है पता... है न मां... क्योंकि चेहरा पढऩा तो कोई तुझसे सीखे, बच्चे की खुशी, गम, उपलब्धी और गलती सब कुछ वह उसका चेहरा देख ही समझ जाती है। बिना कुछ कहे ही वह उसके दिल की हर बात समझ लेती है, ईश्वर की तरह बिन मांगे हर मुराद पूरी करते हुए वह अपने बच्चों को सही रास्ता भी दिखाती है।

एक साथ कई जन्म है जीती

मां की जिंदगी किसी कविता सी सहज और आसान नहीं होती। बच्चे को जन्म देने, उसकी परवरिश करने, उसका करियर बनाने और फिर उसकी शादी करने तक वह कितने ही जन्म एक साथ जी लेती है। बच्चा छोटा हो या बड़ा वह उसकी आंखों में आंसू नहीं देख सकती और उसकी एक पुकार पर दौड़ी चली आती है। देखा जाए तो एक मां अपने बच्चों के साथ धीरे-धीरे बड़ी होती है और परिपक्व होती जाती है।

सुपर मॉम बन जाती

एक-डेढ़ दशक से तो मां का लाईफ स्टाइल कुछ ज्यादा ही मुश्किल और चुनौती भरा होने लगा है। जॉब और घर के अलावा बिल भरने, राशन और सब्जी की खरीदारी करने, राशन एवं कपड़ों पर स्कीम तलाशती, काम वाली बाई को हिदायतें देते हुए वह बच्चों की स्टडी एवं रूटीन पर भी नजर रखते हुए सुपर मॉम बन जाती है।
छोटे बच्चों की सुरक्षा के लिए फिक्रमंद रहते हुए उन पर पूरी नजर रखती है। घर से दूर रहते बच्चों का वह ई-मेल और वीडियो चैटिंग से कभी-कभी हाल चाल पूछते हुए भी एस.एम.एस. एवं व्हाटस एप्प के माध्यम से वह उनके साथ हर दिन टच में रहती है।

बच्चे के जन्म के संग बदलती

दोस्त, पार्टीज, लेट नाईट मूवीज और शॉपिंग करने वाली एक फैशनेबल युवती का पूरा जीवन बदल जाता है..., जब वह मां बनती है। कुछ साल तक उसकी दुनिया अपने बच्चे तक ही सिमट कर रह जाती है। बच्चे के साथ सोना, उठना, खेलना, उसकी हर बात को बिन कहे समझ जाना, रातों को उसके लिए जागना और उसकी भूख-प्यास का ध्यान रखते हुए मानों वह इसे अपना नया जन्म मानती है। अब उसके पर्स में मेकअप का सामान नहीं, बल्कि बच्चे के दूध की बॉटल, डाइपर्स एवं कैंडीज इत्यादि मिलने लगती हैं।

बच्चे संग जीती है हर उम्र 

बच्चों के किशोरावस्था में आने पर मां खुद को भी अपडेट करने लगती है, क्योंकि वह उनकी टीचर ही नहीं, बल्कि उनकी गाईड और दोस्त की भी भूमिका निभाती है। बच्चे के बड़े होने के साथ ही मां की जिम्मेवारियां भी बढऩे लगती हैं।
यह उम्र का वह मोड़ है, जब बच्चों को ही नहीं मां को भी उनके बचपन और बड़े होने की कशमकश परेशान करती है। वह ना तो बच्चों की बातों को सही कह पाती है, ना ही उन्हें सिरे से नकार पाती है। वह उन्हें कितना बांधे रखे और कितनी आजादी दे... जैसे सवालों के साथ वह खुद भी हर दिन बढ़ती और सीखती है।
बच्चों पर निगरानी रखते हुए वह चुपके से उन्हें थोड़ी सी ढील भी दे देती है, साथ ही उन्हें पारिवारिक एवं नैतिक मूल्यों का पाठ भी पढ़ाती चली जाती है।
बच्चों के युवा होने पर उनका उच्च शिक्षा या करियर के लिए  घर से दूर चले जाना या शादी हो जाने पर मां से यकायक दूरी बना लेने पर मानों उसकी रूटीन पर दौड़ती गाड़ी को ब्रेक लगाते हुए उसकी ङ्क्षजदगी में एक खालीपन भर देते हैं।

उड़ते हैं पंछी पंख निकलने पर

बच्चों के स्वयं से दूर होने पर खालीपन क्यों, एक नन्ही चिडिय़ा भी तो अपने बच्चों को दाना खिलाती और बड़ा करती है, फिर एक दिन पंख निकलने पर बच्चे उसे और घोंसले को छोड़ कर उड़ जाते हैं।
यही वह वक्त है कि आप अपनी पुरानी हॉबीज को वक्त दे कर उसे निखार लें या फिर अपनी सोशल एक्टीविटीज शुरू कर दें।
एक बात का ध्यान रखें कि युवाओं को सलाह से बेहद गुरेज होता है, सो बिना मांगे उन्हें सलाह न दें, जब उन्हें आपकी जरूरत हो तो उनकी पूरी मदद करें।

लौटती बच्चों के बचपन में 

ममता का यह पड़ाव उसके जीवन में बेहद खूबसूरत होता है, जब वह दादी-नानी बन कर अपने ही नहीं अपने बच्चों के बचपन को भी दोबारा जीती है। वह अक्सर कहते सुनी जा सकती है, तुम्हारे पापा भी इतने ही शरारती और जिद्दी थे बचपन में... या तुम्हारी मां भी बचपन में ऐसी ही चुलबुली और प्यारी थी। अपने बच्चों के साथ जीवन के फर्ज निभाते हुए जो कमी रह गई थी, उसे वह नाती-पोतियों के साथ खेलते, हंसते और गाते हुए पूरा करती है।
एक बार फिर उसके संस्कारों की पाठशाला खुल जाती है और वह जीवन के खालीपन को भरने में लग जाती है।
जहां वह सबको जोड़ कर परिवार को संयुक्त बनाती है, वहीं सबकी जरूरतों का ध्यान फिर से रखने में जुट जाती है और उसका सफर जीवन के हर कदम पर सिर्फ अपना रूप बदलता है।
                                                                                                                                               हेमा शर्मा

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