आवाज तो उठा



कभी 14 साल की मासूम बच्ची तो कभी 80 साल की प्रौढ़ा पारीवारिक से लेकर सामाजिक तक की शिकार होती है, तो हमें इसकी खबर तभी लगती है, जब मीडिया में इसका चर्चा होता है, नहीं तो हम अपने परिवार और पड़ोस तक में घटने वाली ऐसी घटनाओं को बेहद सहजता से लेते हुए उसे नजर अंदाज कर देते हैं। यदि इस पर चर्चा की जाए तो रोकने का एक ही हल मिलेगा कि महिलाओं को इसके खिलाफ स्वयं ही खुल कर आवाज अठानी होगी, पर वास्तव में देखा जाए तो कितनी महिलाएं अपने खिलाफ होने वाली ङ्क्षहसा के बारे में खुल कर बात कर पाती हैं।

कानून हैं बहुत
महिलाओं पर हिंसा रोकने के लिए आज अनेक प्रकार के कानून मौजूद हैं। घरेलू हिंसा की रोकथाम, दहेज निषेध संबंधी नए कानून के अलावा कार्यस्थलों पर उत्पीड़न रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अनेक दिशा-निर्देश जारी किए हैं, फिर भी उन पर होने वाली हिंसा का सिलसिला कहीं नहीं थमा। इसका सीधा सा कारण जहां कानूनों में कई तरह की खामियां हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें सही तरीके और सख्ती से लागू नहीं किया जाता। नतीजा यह निकलता है कि अपराधी न केवल साफ  बच निकलते हैं, बल्कि उनके हौसले भी बढ़ जाते हैं।
देखा जाए तो ऐसे मामलों की रिपोर्ट करने में महिलाएं और उनके परिजन अक्सर हिचकिचाते हुए नजर आते हैं। कारण साफ है कि अधिकांश मामलों में दोषी भी तो उसके परिजन ही होते हैं।

मानसिकता बदलनी जरूरी
महिलाओं के साथ होने वाली अपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए सरकारी और सामाजिक स्तर पर जो प्रक्रिया चलाई जा रही हैं, वे अब तक हिंसा को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं कर पाई हैं। इसका नतीजा यह है कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराध का प्रतिशत बढ़ रहा है। गांव, शहर, गली और मोहल्ले तक में महिलाओं के साथ हो रही हिंसा की घटनाएं बताती हैं कि अपराधी मानसिकता के पुरुष उनको आसान शिकार समझते हैं। एकांत हो या भीड़ भरे इलाके महिलाओं के साथ कभी भी कुछ भी घटना हो सकती है।
महिलाओं के साथ होने वाली शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न की घटनाओं का विश्लेषण करने वाले यह मानते हैं कि जिस तेजी से महिलाओं संबंधी अपराध बढ़े हैं, उसकी तुलना में ऐसे अपराध के आरोपियों को मिलने वाली सजा में कमी आई हैं। इसका कारण यह है कि महिलाओं के साथ हिंसा या उत्पीड़न करने के आरोपी या तो आरोपमुक्त और बरी हो जाते हैं या न्याय की प्रक्रिया ही इतनी लंबी हो जाती है कि पीड़ित महिला खुद ही अपनी हार मान कर केस वापिस ले लेती है।
आज भी महिलाएं स्वतंत्रता, सम्मान और सुरक्षाभरे वातावरण की तलाश में हैं। आज भी अनेक महिलाएं भय, शोषण, अन्याय के माहौल में अपना जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। आंकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन लगभग 17 हजार महिलाएं किसी न किसी प्रकार से हिंसा का शिकार होती हैं। कम से कम चार महिलाओं को देश के किसी भाग में दुष्कर्म की जानलेवा पीड़ा से गुजरना पड़ता है।
यदि हम यह सवाल उछालें कि ऐसी कितनी लड़कियां या महिलाएं है जिनके साथ कभी किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ अथवा अभद्रता, भाषा या व्यवहार के द्वारा नहीं की गई तो इस सवाल के जवाब में कोई विरली लड़की या महिला ही होगी जो यह कहेगी कि उसके साथ ऐसी कोई घटना कभी घटी है, क्योंकि यह तो बचपन से मिली हुई घुट्टी है कि अपने साथ होने वाली हल्की-फुल्की छेड़छाड़ या अभद्रता से लेकर बड़ी घटना तक को नजरअंदाज कर दो, नहीं तो बदनामी अपनी ही होगी। यदि उसने पलट कर जवाब दिया या शिकायत दर्ज कराई तो उसे प्रतिदिन अपराधिक मानसिकता वाले लोगों से दो-दो हाथ करना होंगे।

दलना होगा नजरिया
बेटी को बचपन से ही सहनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है। आज समय आ गया है कि बेटियों को छेड़छाड़, अभद्र व्यवहार का तत्काल जोरदार जवाब देना सिखाया जाए, तभी अपराधिक मानसिकता को बढ़ने से रोका जा सकेगा, क्योंकि आज केवल दलित, पिछड़ी और वंचित वर्ग की ही नहीं बल्कि उच्च वर्ग और सम्पन्न घराने की महिलाएं भी शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़नाओं का शिकार हो रही हैं।
आज हिंसा की शिकार महिलाओं को सही और पूरा न्याय नहीं मिल पा रहा तथा वे सामाजिक न्याय के मामले में भी भेदभाव की शिकार हो रही है। वह कहती हैं कि आज की नारी को स्वयं को इतना मजबूत बनाना होगा कि वह अपने खिलाफ होने वाली हिंसा का जवाब दे सके या फिर दोषी की शिकायत कर सके। जब तक वह पुरुष सदस्यों पर निर्भर रहेगी, तब तक वह स्वयं निर्णय ले भी नहीं पाएगी।
आज जरूरत इस बात की भी है कि महिलाओं के प्रति समाज में संवेदनशीलता बढ़ाई जाए तथा अपराधिक मानसिकता को सख्ती से खत्म किया जा सके। जब अपराधियों को कड़ी सजा मिलेगी तो दूसरों को सबक अवश्य मिलेगा। इसके लिए महिलाओं और उनके सम्मान एवं सुरक्षा के पक्षधर पुरुषों को एकजुटता से साझा प्रयास करने ही होंगे।

बढ़ रहे हैं आकंड़े
नैशनल क्राइम अगेंस्ट वूमैन रिपोर्ट के अनुसार हर 29 मिनट में देश में एक बलात्कार, 15 मिनट में भद्दी छेड़छाड़, 63 मिनट में महिला से शारीरिक छेड़छाड़, 16 मिनट में महिला का कत्ल, 9 मिनट में घरेलू हिंसा तथा 77 मिनट में दहेज हत्या की शिकार महिलाएं हो रही हैं।
जबकि यू.एन. रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार भारत में इस समय 68 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा, 66 प्रतिशत छोटी बच्चियां अपने घरों में यौन शोषण की शिकार हो रही हैं, जिनमें अधिकांश केसों को थाने तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता। यही नहीं 43 प्रतिशत छोटी लड़कियों को जिस्म-फरोशी के लिए दूसरे शहरों में भेजने के मामलों में भी वृद्धि हुई है तथा 39 प्रतिशत देह व्यपार के मामलों बढ़ौतरी हुई है।
हर साल 5500 महिलाओं की दहेज के लिए हत्या हो रही है तथा 10 प्रतिशत केस ही रजिस्टर्ड होते हैं, अत: वास्तविक तस्वीर इससे कहीं ज्यादा भयानक है।
बलात्कार के केसों में 24 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है तथा 39 प्रतिशत देह व्यापार के केस बढ़े हैं अर्थात सन 2010-11 की इस रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा में दिनों-दिन वृद्धि ही हुई है, जो कि चिंताजनक है।
महिलाओं की स्थिति भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, बांगला देश और साउथ एशिया में भी बदतर है। भारत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या के मामले सबसे अधिक देखने को मिलते हैं।
हेमा शर्मा

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