बदलाव का फैसला तो स्वयं ही लेना होगा

फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई का वह दृश्य तो आपको याद होगा कि एक आदमी द्वारा दूसरे के घर के आगे पान थूक कर जाने पर घर के मालिक द्वारा उस जगह को स्वयं साफ कर देना, एक दिन उस थूक कर जाने वाले आदमी को अपनी आदत सुधारने पर विवश कर देता है। यह बात भले ही गांधीगिरी की है, परंतु इसमें कहीं ना कहीं बदलाव की भावना भी काम कर रही होती है, क्योंकि अक्सर हम दूसरों के व्यवहार या समाज की संवेदनहीनता को लेकर यही सोचते हैं कि आखिर बदलाव कब आएगा।
दुनिया को देखने का हर किसी का अपना ही नजरिया होता है, इस लिए कुछ चीजें यदि एक के लिए सही और फायदेमंद है तो दूसरे के लिए बुरी और नुकसानदेह भी हो सकती हैं, इसलिए बदलाव का फैसला तो हर किसी को अपना ही लेना होगा, इसलिए दूसरों को बदलने का प्रयास छोड़ कर सिर्फ स्वयं में ही बदलाव लाएं तो दूसरे भी आपकी देखा-देखी अपने आप बदलने लगेंगे।
आरंभ में यह रास्ता मुश्किल जरूर लगेगापरंतु जब आप अपनी आदतों में बदलाव लाने की हर दिन कोशिश करेंगे तो हर चीज आसान लगनी शुरू हो जाएगी। इसके लिए आपको ही तय करना है कि वास्तव में आप चाहते क्या हैं और कौन सी बातें आपको जीवन की सही राह पर ले जा सकती हैं।
जिस प्रकार गिर कर खड़े होना मुश्किल है, वादा करके निभाना मुश्किल है और रास्ते में किसी का एक्सीडैंट हुआ देख कर उसकी मदद को रुकना है, उसी प्रकार दूसरों में सुधार लाने के बारे में सोचना भी मुश्किल है। किसी दूसरे द्वारा अपना नुकसान किए जाने पर उससे बदला लेने की सोचना बहुत आसान हैपरंतु उसे भुला कर अपनी ज़िंदगी में आगे बढऩा उतना आसान नहीं होता। इसी प्रकार जरूरत के समय किसी को दोस्त बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके सुख दुख में काम आकर दोस्ती को मजबूत बनाना उससे भी जरूरी है।
यदि चाहें तो इस प्रकार के सबक बच्चों से आसानी से सीखे जा सकते हैं, क्योंकि ना तो वह दुश्मनी जानते हैं और मुसीबत के समय दोस्तों को अकेले छोड़ते हैं। उनके व्यवहार में अपने और पराये के लिए एक जैसा ही व्यवहार होता है और वह है दोस्ती और अपनेपन का और शायद इसी लिए ना उन्हें बदलाव लाने की इच्छा होती है और ना ही किसी से कोई शिकायत होती है।
अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में हम स्वयं को ही भूलने लगते हैं और दूसरों से प्यार और सम्मान पाने की उम्मीद में हम स्वयं को ही नजरअंदाज करने लगते हैं और कहीं ना कहीं स्वयं ही अपने सम्मान को चोट पहुंचा बैठते हैं। कोई दूसरा आपके हुनर को पहचानेगा, इसे छोड़ कर स्वयं अपनी कीमत को पहचानें और स्वयं से प्यार करना सीखें, तो ही दूसरे आपको पहचानना शुरू करेंगे।
पहले स्वयं तो दूसरों की मदद करना और ठेस पहुंचाने वालों को क्षमा करना तो सीखें। पहले स्वयं तो एक पौधा लगा उसे सींच कर वृक्ष बना कर तो देखें, पानी की हर बूंद की अहमियत है पहले स्वयं तो समझ कर पानी बचाना सीखें, फिर देखें कि आपका नाम उदाहरण बनते हुए दूसरों को भी बदलने की प्रेरणा देगा। जब तक हम नहीं बदलते दूसरों से उम्मीद रखना व्यर्थ है।
स्वयं में बदलाव ऐसे भी ला सकते हैं कि उन लोगों से हमेशा दूर रहें जो आपको हमेशा हीन दिखाने का या आपका मनोबल तोडऩे का प्रयास करें, क्योंकि उनकी नाकारात्मक सोच आपके हर प्रयास को धूमिल करते हुए आप पर हावी हो सकती है।

हेमा शर्मा

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